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बिंब आणि प्रतिबिंब

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जे डी म्हणजे जयदीप, माझ्या या वाडीत कविता कथा समीक्षा परीक्षा याची आहे ही पोतडी. मी एक मार्केटिंग चा कार्यकर्ता अणि मराठीप्रेमी गडी. माझी वाडी ही मराठवाडी आवडेल तुम्हाला थोड़ी थोड़ी

Tuesday, March 1, 2011

इंजिनीअर ची गोष्ट

मित्रांनो , कधी कधी वैफल्य फ्रस्ट्रेशन चांगली रचना घडवून आणते याचा मला प्रत्यय आला .
ही कविता मी दोन भागात जवळ जवळ ६ महिन्याच्या गॅप मध्ये लिहिली .. पुण्यात आलो तेव्हा सुरवातीला अट्टहास म्हणून आणि नंतर साफ्टवेअर मध्ये मंदी म्हणून नोकरी मिळत नव्हती .. म्हणजे तसा योग नव्हता ..
आणि मग मला एक माझ्या अवस्थेचे विडंबन लिहावे वाटले ..ते लिहले ... पहिला भाग नुसता निगेटिव आहे आणि नंतर अगदी सहा महिन्यानंतर मला एका कंपनी मध्ये नोकरी मिळाली आणि त्याच दिवशी याचा अर्धा भाग पूर्ण केला जो एकदम उमेदीचा होता 
कविता हिंदी मध्ये केली होती आवडली तर प्रतिक्रिया नक्कीच पहायला आवडेल ..

एक लड़के ने आज अखबार देखा
तो नौकरी का एक इश्तिहार देखा
लड़के के मुह पर चमक सी आई
कहा ' बहुत दिनों के बाद फ्रेशर की कोई अॅड आई '
     
इंजिनीअर था वो होनहार था
बस एक साल से बेकार था 
आज का दिन मानो त्यौहार था
तो क्या हुआ की खाने का आज इतवार था 

उसने झट से दाढ़ी बनायीं
दो तीन बार डिग्री झटकाई
कहीं से तो एक कमीज लायी 
और कहा' बहुत दिनों के बाद फ्रेशर की कोई अॅड आई '

गया वो दौड़ के उस जगह पर
पर भीड़ लगी हुई थी वहां पर
उसने रेजुमे की कॉपी टेबल पर रखवाई
तो रिसेप्शनिस्ट ने कहा अरे ?
अभी तो है रिजल्ट की सुनवाई 
तुने अर्जी लेट से तो रखाई 
मगर कोई सिफारिश नहीं लायी 
वो बोला चलो , इसी बहाने कंपनी देखने की तो नौबत आई 
और कहा' बहुत दिनों के बाद फ्रेशर की कोई अॅड आई '

वापस अपने घर जाने देखा
पर पेट था सुखा सुखा 
तभी उसने एक वड़ापाव वाला देखा
दबी आवाज में वो बोला ' एक वड़ापाव देना यार'
   वड़ापाव वाला गुराया ' खाना नहीं खाया  या आया है बुखार '
तो लड़का बोला अरे मै इंटरव्यूव  देने आया था
कुछ सपने लेकर आया था
यहाँ तो जगह पहले से भर गयी 
क्या ख़ाक फ्रेशर की अॅड  आई 

वड़ापाव वाला बोला
अरे यार क्यों हो बेकार ?
वड़ापाव की ठेली दाल और पब्लिक को पुकार
कमाएगा हजार हजार .
इंजिनीअर बोला मै ' इंजीनिअर ' हूँ 
देश का होनहार हूँ 
अगर ठेला ही डालना था 
तो भला इंजिनीअर क्यों बनना था 

अरे मगर ये डॉक्टर ने ठेली लगायी है
तो इंजिनीअर की क्या औकाद आई है
मैंने तो क्लिनिक भी इस ठेली के बाजू में लगायी है
अगर वडे से पेट दर्द हुआ दवाई भी रखाई है
बेकार रहने में तेरी क्या भलाई है 

तभी लड़का चौंक गया
कहा ' मै अकल का अँधा था बन गया '
तुने मेरी आँख खुलवाई 
तेरी ठेली पे कोई वेकंसी  है मेरे भाई ?
अरे .. मैंने रिज्यूमे की कापी भी है लायी 

वड़ापाव वाला चिल्लाया 
अरे गधे तू कभी सुधरेगा या नहीं
नसीब ऐसा तेरा कभी खुलेगा नहीं
तू बिखारी भी बन जाएगा 
क्या किसी बिखारी के लिए भीख मांगेगा ?
जब तक खुद कुछ नहीं करेगा
पैसे के लिए मारा मारा फिरेगा
जब तू क्यु में  खड़ा रहेगा
क्यु में ही मरता जाएगा
कभी खुद बिजनेस करेगा 
अपने लिए  क्यु बनवाएगा ..
शायद खुद  फ्रेशर का इश्तिहार देगा ...

इंजिनीअर के बात अब समझ में आई
उसने डिग्री पे वड़ापाव रखाई
और मन ही मन में कहाँ  
' आज फ्रेशर की चमकती किस्मत है आई '
कोई डिग्री को रद्दी में ले लो भाई 
सब बेकारों को बधाई हो बधाई 

जेडी
१५/०१/२००२  
आणी २६ /०६/ २००२  





6 comments:

  1. सुंदर.. आवडली !!

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  2. सुंदर...मस्त...आवडली...
    (एका इंजिनिअरच्या प्रतिक्रिया....)

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  3. धन्यवाद मित्रांनो , असेच वाचत राहा लिहित राहा
    जेडी

    ReplyDelete
  4. varche var tu bharich hot challa aahes.....

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