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Monday, September 25, 2017
Wednesday, August 18, 2010
आशिक की दास्ताँ
तुम इस मोड़ पे मुझसे मिले की जहाँ आगे रास्ता नहीं था
हाथ बढाया था तुने मगर तब मेरा साथ ही नहीं था
तड़पता रहा मई पानी के बिना मगर वहां कोई नहीं था
तुमने सागर बहाया मगर मेरी साँसों में तब दम ही नहीं था
लौट रही थी मन की मौजे मन के समुंदर में जब साहिल ही नहीं था
अब साहिल इन्तजार करता है रात दिन जब दरया में पानी ही नहीं था
मेरी ख़राशे घाव बन गए तब दवा लगाने कोई नहीं था
तुम मरहम लेके आ गए जब घाव क्या मै ही नहीं था
अब न बहाओ आसुंओ को मै आज नहीं कल था
पर सुनना लोगों से कभी किस्सों में ... तुम्हारा भी आशिक हुआ करता था
जयदीप भोगले
१८ -१०-१९९९
हाथ बढाया था तुने मगर तब मेरा साथ ही नहीं था
तड़पता रहा मई पानी के बिना मगर वहां कोई नहीं था
तुमने सागर बहाया मगर मेरी साँसों में तब दम ही नहीं था
लौट रही थी मन की मौजे मन के समुंदर में जब साहिल ही नहीं था
अब साहिल इन्तजार करता है रात दिन जब दरया में पानी ही नहीं था
मेरी ख़राशे घाव बन गए तब दवा लगाने कोई नहीं था
तुम मरहम लेके आ गए जब घाव क्या मै ही नहीं था
अब न बहाओ आसुंओ को मै आज नहीं कल था
पर सुनना लोगों से कभी किस्सों में ... तुम्हारा भी आशिक हुआ करता था
जयदीप भोगले
१८ -१०-१९९९
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एव्हरेस्ट
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