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Friday, February 11, 2011

वादा


वादा है अपने आप से एक वादा ना तोडना है
झूठा ही सही दिल से एक वादा जरूर करना है

चेहरे की कसक से खींच गए हम एक भंवर में 
भीगा ही सही बहाव को एक साहिल से अब जोड़ना है

पत्थर और फूल को एक तराजू में तोलने का गजब हम से हो गया
शीशे को आईने में बदलेंगे ऐसा सबब कुछ करना है

अब वादा एक सच है या इस ख्वाब को तोड़ देना है
रगों में बहता है जो खून उसी को बस एक शायरी में बदलना है

जयदीप भोगले
१०/०२/२०११ 

Wednesday, January 12, 2011

इंतज़ार और तूफ़ान

जब  तूफ़ान  में  किसीका  इंतज़ार  होता  है 
तो  एक  पैगाम  भी  साहिल  बन  जाता  है 
ना  सफ़र  पता  है  ना  मंजील 
बस  पैगाम  का  सहारा  ही  नाव  का  किनारा  बन  जाता  है 

एक  तिनका  भी  किसी  के  प्यार  का 
       इंतज़ार  में  कश्ती  बन  जाता  है 
उसीसे  आती  है  तूफ़ान  से  लड़ने  की  उमीदे 
लहरों  का  सामना  भी  उसीसे  आसान  हो  जाता  है 


एक   नजर  के  खातिर  मीलो  पार  हो  जाते  है 
      जब  उनकी  आखों  में  प्यार  का  इकरार  नजर  आता  है 
      एक  ख़त  के  भरोसे  कट  सकती  है  जिंदगी 
      एक  ख़याल  मुलाक़ात  का  उनका  दामन  बन  जाता  है 

जब  कोई  ख़त  के  लिए  तड़पता  है 
उसके  जिंदगी  का  लम्हा  भी  तूफ़ान  बन  जाता  है 
इंतज़ार  होता  है  एक  लब्ज़  का 
उसका  ना  होना  क़यामत  बन  जाता  है 


जयदीप भोगले
२००५


Wednesday, September 15, 2010

आशा की किरन

ए दिल तू बता तू क्यों  उदास है
अश्क तेरे पास है फिर तुझे क्यों प्यास है
क्यों है मन में शोर
जब चारो और सन्नाटा है
जब आग ही लगी है दिल में
तो चिरागों की रौशनी की आस है
जब बह रहा है खून तो
हाल ए दिल सुनाने को कलम की क्यों तलाश है
ना ढूंढ़ तू दवा जब दर्द तेरे पास है
कलेजे का टुकड़ा चला गया
तो क्यों उठी घाव से वह कराह?
अरे ये महज एक खराश है !
बेवफाई से हुआ तू घायल
तो वफ़ा की क्यों फरमाइश है?
पत्थर की कियी थी आजमाइश तुने
तो पत्थरदिल से यह कैसी कशिश है ?
मीठे जहर से हुआ था बेहोश
इसलिए मुझे अफ़सोस है
देख जिंदगी को ख़ुशी से
तो चमन ए जन्नत तेरे साथ है
नाही तो सब वीरान और ख़ाक है

जयदीप भोगले
२६ -०२-९९

Tuesday, August 31, 2010

मैकशी





जो मै को भुलादे वो मै क्या है
जो दिल को ना जला दे वो मै क्या है
जो हलक से उतर गयी  एक बार
पूछोगे ए यार तुम के तू क्या है
            





 पैमाने से मै को पीनेवाले हजार हुए
  मै से महफील सजानेवाले हजार हुए
  जो मीना के आँखों से पीकर नहीं होते बेहोश                                                 
  तो उसने नहीं जाना की ये मै क्या है
जब मै साथ हो तो वक्त बेवक्त नहीं होता
रात का नहीं होता इन्तजार दिन का डर नहीं होता
नशा गम से नहीं होता ज्यादा ख़ुशी से कम नहीं होता
जो नशे में फर्क जताए वो मै क्या है
                           जहाँ में मै कभी महफील बसाती है
                           तो मै मै को बेखुद कर जाती है
                           जो खानाबदोश होते है मैखाने से
                          मै से मै ना रहे वो शख्स ही क्या है
पर इस मै को भी समझाओ
की महबूब क्या होता है
मै के बूँद से है नशा तो
महबूब की हर अदा से होता है
जो माशूक को भुलादे वो मै क्या है
उस मै से क्या मतलब हमें 
जो न समझे के ये इश्क क्या है


जयदीप भोगले
१३-०१-२००३

Friday, August 27, 2010

यूँ अगर होता

यूँ अगर होता के तुम पास होते
तो हम सितारों से ना बाते करते
   अगर जिन्दगी में तुम्हारी आँखों के साए रहते
    तो हम तपती धुप में यूँ जल ना जाते
अगर हमारे आंसू पोछने तुम्हारे हात ना आते
अश्क हमारे सागर बन जाते
       इस पागल दिल को ये सवाल ना रहते
      अगर जवाब हमारा तुम बन जाते
अगर गज़ल ही हमारी तुम बन जाते
शायरी के लिए ये खून के कतरे यूँ जाया ना जाते

जयदीप भोगले
३०-०९-१९९९

Wednesday, August 25, 2010

क़यामत



आज कुछ जख्म भर आये है
आँखों में उनकी नजरो के कुछ सपने सुहाने आये है
एक भोली सी नजर है वह
जिन के दिल के करीब हम आये है
तम्मनाओं की बहार से
एक कशिश लौट आई है
दश्त इ सहरा में एक कली सी खिल आई है
एक सवाल के आरजू से
वो जवाब बन के आई है
एक मासूम सा चेहरा है चेहरे पे लाली छाई है
इस संगदिल में धड़कन धडकते आई है
लगता है मुर्दे भी जिन्दा होते है
एक क़यामत जिंदगी बन के आई है
जयदीप भोगले
१८ नवम्बर २००३ 

अनकही


 कभी सपने हकीकतों के साथ
कभी आँखों और आंसुओ की बात
कभी तन्हाई और वो ख़यालात
यही है अनकही एक कहानी के साथ
               एक बारिश की बूँद धुप के बाद
               एक फूल की नरमी कांटो के बाद
                 वो बेखुदी कारवां के साथ
                यही है अनकही एक कहानी के साथ
एक आवाज ख़ामोशी के पास
एक लहर एक पत्थर के पास
एक जिन्दगी क़यामत के साथ
यही है अनकही एक कहानी के साथ
जयदीप भोगले
१२ नवम्बर २००४

Monday, August 23, 2010

पलटते पन्ने


इन पन्नो में लिखी कहानी कुछ नयी है कुछ पुरानी है
पलटते रहना ही बस इनके जिन्दगी की कहानी है
   कुछ हसीं लम्हों का जमाना इनमे छुपता है
   कभी तडपता दिल इनके सिने में सिसकता है

   पहली बरसात तो पहला पन्ना था
   अब गम के आंसू से ही इनको निभानी है
                कभी इंद्रधनुष भी इनमे बसता था
               एक चेहरे का चांद इनमे दिखता था
              अब चांदनी कि चमक तो चली गयी
             बस बुझते दिल कि रोशनी में जिंदगी कि कहानी लिख जानी है
     दिदार ए यार का बयां इसपे लिखा है
     ज़माने भर का प्यार इसमें बीता है
   अब हिज्र की कलम से ही इनको तक़दीर आजमानी है
    पलटते रहना ही बस इनके जिन्दगी की कहानी है
जयदीप भोगले
३० जून 2001

Wednesday, August 18, 2010

आशिक की दास्ताँ

तुम इस मोड़ पे मुझसे मिले की जहाँ आगे रास्ता नहीं था
हाथ बढाया था तुने मगर तब मेरा साथ ही नहीं था
             तड़पता रहा मई पानी के बिना मगर वहां कोई नहीं था
तुमने सागर बहाया  मगर मेरी साँसों में तब दम ही नहीं था
      लौट रही थी मन की मौजे मन के समुंदर में जब साहिल ही नहीं था
         अब साहिल इन्तजार करता है रात दिन जब दरया में पानी ही नहीं था
मेरी ख़राशे घाव बन गए तब दवा लगाने कोई नहीं था
तुम मरहम लेके आ गए जब घाव क्या मै ही नहीं था
        अब न बहाओ आसुंओ को मै आज नहीं कल था
       पर सुनना लोगों से कभी किस्सों में  ... तुम्हारा भी आशिक हुआ करता था 
जयदीप भोगले
१८ -१०-१९९९    

Tuesday, August 17, 2010

सवाल मत पुछो


धडकनों को ना पुछो की तुम क्यों धडकती हो
चिरागों को न पुछो तुम क्यों सुलगते हो
फूल को ना पुछो तुम क्यों महकते हो
सवाल ना करो मेरे यारो
क्यों आशिकों को परखते हो
                  पायल क्यों छनकती  है
                    बुलबुल क्यों चहकती है
                  हवा का झोंका ना हो तो भी
                   चिलमन क्यों लहराती है
             महसूस करो इनको मेरे यारो
                 क्यों लब्ज पे अटकते हो
हीना कब रंग लती है
कली कब फूल बन जाती है
शायरी कब बन जाती है
जवाब ना मांगो मेरे यारो
मोहब्बत सब सिखाती है

जयदीप भोगले
१० एप्रिल  १९९९

Thursday, August 12, 2010

उदासी

ये कैसी ही उदासी

उसकी याद जहन से न जाती
दिल ही बेबस लबो ओये ही खामोशी
जी राहा हुं जिंदगी जो खुदा ने ही बख्शी

ये कैसी ही उदासी
ख़ुशी होती है मगर रहती है सिसकीया जरासी
जख्म भरते है मगर बचती है खराशे जरासी
सोता हुं रात को मगर सपने से न वो जाती
एक कशिश है वो पर सीमटीसी शर्मायीसी

पड़ती है बारिश की बूंदे मगर ठंडी आग है जलाती
भुलाना चाहता हूँ मगर उठती है कसक जरासी
पीता हूँ जाम जब  पैमाने जैसे जिन्दगी है बाकि सी
टूटे दिल को जोड़ता हूँ तो बन जाती है तसवीर खुबसूरत सी
जो है बेवफा ऐसे मेरे माशूक की

इश्क का मर्ज यारो ऐसा
जैसे तलवार  हलक से उतर है जाती
बहता है खून बचती है बूंदे
वही दिल से कराह है उठाती
तभी दर्द शायरी  बन है जाती
शायरी बन जाती

हिंदी शायरी उदासी कविता
जयदीप भोगले
१२-०१-९९

एव्हरेस्ट

 ज्याचे त्याचे एव्हरेस्ट एव्हरेस्ट अस शिखर एकच नसतं प्रत्येक माणसाचं एव्हरेस्ट वेगळं असतं उंची कमी जास्त असेल समाजात शिखराची पण सर केल्यावरच...