आँसू भरी कलम से ममता भारी हथेली पे
माँ तेरी चिट्ठी लिखती है
घर राह देखे तेरी लाल मेरे ये आखें तेरी राह तकती है
जबसे तू गया बिदेस सुने पड़ गए आँगन
जब खेले छोटे बच्चे याद आये तेरा बचपन
दूध के प्याली में तस्वीर तेरी झलकती है
ममता के मोम को बनाया था पत्थर मैंने
माथे पे विजयी टिका सजा के विदा किया था मैंने
एक माँ की इच्छा थी की लाज रखे तू जन्मदात्री की
पर माँ की ममता अब "पत्थर" से लहू रुलाती है
खेल रहा है तू खून की होली
पर बहु के रंग अब सजाते नहीं रंगोली
हाथों से अपने सिन्दूर तेरा वो अपनी मांग में भरती है
पर लाज भरी वह आखें अब आंसू भरी रहती है
उस अबला की पवित्रता इन्तजार तेरा करती है
पर देश की आन का समय है यह
तो दूध का कर्ज तुम्हें उतरना होगा
शहीद भी हुआ अग़र तू विजयी तुम्हे होना होगा
भावनओं के फूल कर्तव्य के काटों से ही सजते है
एक तू ही नहीं है वहां हर माँ के बेटे रहते है
पर फर्ज के ऊँचे के पहाड़ो के पीछे
प्यार की कुटिया में माँ भी तेरी रहती है
जयदीप भोगले
जून १९९९
हिंदी
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
एव्हरेस्ट
ज्याचे त्याचे एव्हरेस्ट एव्हरेस्ट अस शिखर एकच नसतं प्रत्येक माणसाचं एव्हरेस्ट वेगळं असतं उंची कमी जास्त असेल समाजात शिखराची पण सर केल्यावरच...
-
ज्याचे त्याचे एव्हरेस्ट एव्हरेस्ट अस शिखर एकच नसतं प्रत्येक माणसाचं एव्हरेस्ट वेगळं असतं उंची कमी जास्त असेल समाजात शिखराची पण सर केल्यावरच...
-
31 डिसेंबर मला भारी अजब वाटते कधी मागच्या वर्षाचा कॅलिडोस्कोप तर कधी नवीन वर्षाची दुर्बीण वाटते तिला पहिल्या भेटीची भाषा कळते नव्या काम...
-
मित्रांनो , कधी कधी वैफल्य फ्रस्ट्रेशन चांगली रचना घडवून आणते याचा मला प्रत्यय आला . ही कविता मी दोन भागात जवळ जवळ ६ महिन्याच्या गॅप मध्ये...
No comments:
Post a Comment