Friday, September 3, 2010

नीलपरी



आसमान जैसे बरसती हो तुम
लहर जैसे उभरती हो तुम
एक अहसास है बेखुदी का
कायनात की नीलपरी हो तुम


दीदार का एक लम्हा थम गया है
तुम्हारा एक दीवाना बन गया है
ये  ख़याल अगर सवाल बने 
क्या इसका जवाब जानती हो तुम


कुछ कांटे फूल के साथ होते है
कुछ परवाने शमा के साथ जलते है
पर आप जब साथ होते है
हम गुलाम और आप ख़ास होते है 


जयदीप भोगले
२७-०२-२००५ 

Wednesday, September 1, 2010

धड़कन



एक कश्ती सागर में अकेली चलती है
जैसे झील के उस पार हवा चलती है
जैसे मन में एक कल्पना बसती है
उसी तरह तुम्हारी धड़कन मेरे दिल में धडकती है
                    जैसे एक चिंगारी बारूद में जलती है
                    जैसे एक लौ अँधेरे में उजलती है
                    जैसे एक निगाह लाखों में उभरती है
                     उसी तरह तुम्हारी धड़कन मेरे दिल में धडकती है
एक सांस से जिन्दगी पनपती है
एक आवाज ख़ामोशी में चहकती है
जैसे हरियाली मानो रेगिस्तान में दहकती है
उसी तरह तुम्हारी धड़कन मेरे दिल में धडकती है




जयदीप भोगले
२७-१२-२००४





Tuesday, August 31, 2010

मैकशी





जो मै को भुलादे वो मै क्या है
जो दिल को ना जला दे वो मै क्या है
जो हलक से उतर गयी  एक बार
पूछोगे ए यार तुम के तू क्या है
            





 पैमाने से मै को पीनेवाले हजार हुए
  मै से महफील सजानेवाले हजार हुए
  जो मीना के आँखों से पीकर नहीं होते बेहोश                                                 
  तो उसने नहीं जाना की ये मै क्या है
जब मै साथ हो तो वक्त बेवक्त नहीं होता
रात का नहीं होता इन्तजार दिन का डर नहीं होता
नशा गम से नहीं होता ज्यादा ख़ुशी से कम नहीं होता
जो नशे में फर्क जताए वो मै क्या है
                           जहाँ में मै कभी महफील बसाती है
                           तो मै मै को बेखुद कर जाती है
                           जो खानाबदोश होते है मैखाने से
                          मै से मै ना रहे वो शख्स ही क्या है
पर इस मै को भी समझाओ
की महबूब क्या होता है
मै के बूँद से है नशा तो
महबूब की हर अदा से होता है
जो माशूक को भुलादे वो मै क्या है
उस मै से क्या मतलब हमें 
जो न समझे के ये इश्क क्या है


जयदीप भोगले
१३-०१-२००३

Monday, August 30, 2010

असेच... नेहमी ..आयुष्यावर बघू ( बोलू) काही .


कार्यक्रम- आयुष्यावर बोलू काही
 दिनांक रविवार २९ ऑग २०१०- 
वाहिनी -   झी  मराठीवर झाला, ( होत असतो )
                बाजारात सी डी उपलब्ध आहे
 सलील आणि संदीप यांची बहारदार मैफल 
कालच संध्याकाळी झी मराठी वाहिनीवर संध्याकाळी हा कार्यक्रम पुन:प्रक्षेपित करण्यात आला आणि या कार्यक्रमाबद्दल कुठेतरी लिहावे असे वाटले म्हणून हा  छोटासा प्रयत्न ..
आजकाल अभिरुचीसंपन्न साहित्य, कविता ,गाणी हवी असतील तर आपल्याला जुन्या लेखकांच्या दुनियेत जावे लागते किंवा जुन्या ध्वनिमुद्रित गीतांकडे वाट वळवावी लागते असे जर आपणास वाटत असेल, तर कदाचित ही समीक्षा आपल्याला काहीसे आपले मत बदलायला लावेल पण वेगळ्या पण तितक्याच अभिरुचीच्या जगात जायची वाट दाखवेल.
डॉ सलील कुलकर्णी आणि संदीप खरे यांनी सुरु केलेल्या " आयुष्यावर बोलू काही " या कार्यक्रमाबद्दल जर सांगयचे झाले तर हा एक अभिरुचीसंपन्न आणि दर्जेदार मैफिल आहे जी काही काळ आपल्याला जगण्याच्या सर्व क्षणांची अलवार अशी आठवण करून देते.त्यावर प्रेम करायला शिकवते.
झी मराठीने ५०० वा विशेष भाग विशेष निर्मित करून गेल्या वर्षी आपल्या समोर सादर केला. आणि अगदी २ वेळा थेट कार्यक्रम बघणा-या लोकांनीही तितक्याच आवडीने  हा कार्यक्रम पहिला .
विशेष म्हणजे सलील आणि संदीप यांच्या जोडगोळीबरोबर बेला शेंडे यांची गीते , सुनील बर्वे यांचे निवेदन यामुळे या कार्यक्रमाची लज्जत आणखीनच वाढली.
शिवाय काही मातब्बर मंडळी , सोनाली कुलकर्णी मधुरा वेलणकर यांसारखी नयन सुखवर्धक उपस्थिती कानाबरोबर डोळ्यानाही सुखावण्याची काळजी घेत होती हे ही इथे सांगावेसे वाटते . 
हा कार्यक्रम एखाद्या निरस माणसाला सुद्धा कवितेबादल प्रेम नाही तर आदर तर  नक्कीच निर्माण करत असावा.
तसा आयुष्यावर बोलू काही नवीन असतानाच पुण्यात मी एका छोट्या सभागृहात पाहिला होता. " मी मोर्चा नेला नाही" नामंजूर , लव लेटर , या सारख्या कवितांना मिळणारा तरुणाईचा ( माझा सुद्धा-- कारण मी सुद्धा तरुणच आहे ) प्रतिसाद पाहून कुठेतरी कळून गेले की यांची फ्यान मंडळी हि बरेच आहेत.आणि ही वाढतच जाणार आहेत 
 हा कार्यक्रम नुसताच तरुण लोकांचा तरुण लोकांसाठी  आहे असे नाही , सलील आणि संदीप यांनी हा कार्यक्रम त्यांच्या नवीन अल्बम आणि चित्रपट गीतांनी नित्य नूतन बनवण्याचा प्रयत्न केला आहे. त्यामुळे ढीपरी  ढिपांग, अग्गोबाई ढग्गोबाई , निशाणी डावा अंगठा या मधल्या काही वेगळ्या पण श्रवणीय अशा गीतांनी अबालवृद्धाना आवडणारा बनतो आहे.
या कार्यक्रमात गायलेले "बाबांची कहाणी" बघितल्यावर भावपूर्ण गीतांना भाडोत्री अश्रूंची गरज नसते हे कुठेतरी जाणवून जाते. आणि कदाचित टी वी वाहिन्यांसाठी ही पर्वणी आणि आश्चर्याची बाब असे दोनीही ठरली असावी
. हा कार्यक्रम म्हणजे मला माझ्या पुण्यातल्या होस्टेल जीवनासारखा पुढे जातो असे वाटते.. सकाळी उठावे बेडेकर मिसळ खावी मग, बादशाही मध्ये जेवण नंतर फुलचंद पान ,संध्याकाळी हिंदुस्तान बेकरीची प्याटीस, आणि रात्री प्रभातचा सिनेमा किंवा बालगंधर्वला नाटक अगदी पुणेरी आणि साधा वाटला तरी अस्सल मराठमोळा आणि लज्जतदार अनुभव ... अगदी तसाच अनुभव या कार्यक्रमात येतो .
 आता मी इतर कार्याक्रमंवर टीका म्हणून नाही पण सांगतो प्रत्येक कार्यक्रमला आपला एक बाज असतो आणि तो तसाच पुढे जातो आणि संपतो. पण वैविध्य टिकवणे आणि सर्वाना ते आवडणे हे खूप अवघड असते
 आणि " आयुष्यावर बोलू काही" मध्ये चपखलपणे हे सलील आणि संदीप साधून जातात. 
आता या कार्याक्रमची सी डी बाजारात आली आहे पण तरीही मला सांगवेसे वाटते एखादी संध्याकाळ, अगदी दिवसही चालेल पण आयुष्यावर बोलू काही आपल्या शहरात आल्यास चुकवू नये .
प्रेमभंग असो की प्रेमात रंग असो , तरुण असो की म्हातारा , मित्रांची टोळी असो की मैत्रिणीची टाळी, हा कार्यक्रम कुणाबरोबर ही बघता येईल त्याचा आनंद लुटता येईल.  या कार्यक्रमाबद्दल मला वेगळेसे सांगावे लागणार नाही पण इतर शहरात, भारताबाहेर आपल्याला हा कार्यक्रम माहित नसेल तर हा अवश्य पाहावा .. 
म्हणूनच म्हणतो जरा चुकीचे जरा बरोबर बोलू काही .. चला दोस्त हो आयुष्यावर बोलू काही...
जयदीप भोगले
३० -०८-२०१० 
 
 


ख़ामोशी


ख़ामोशी एक बड़ी सजा है
पर कहते है उसका भी अपना मजा है
     हसना चाहता हूँ मगर कैसे
    मेरा एक घाव अभी तक ताजा है
रोने के इरादे से रो नहीं सकता कोई
आँखों के झरने है ख़ाली और ना कोई बादल गरजा है
   खुशियाँ मनाऊं कैसे जब मुझपे मेरे मन का कर्जा है
   घर जाना चाहता हूँ जब एक अनसुनी आवाज ने संदेसा भेजा है
   पर फिसलते है कदम बढाता जब उन्हें पर कहते है के पानी बरसा है
सुना है खाव्बो के घोड़ो पे सवार सात समुंदर भी कोई जाता है
पर खाव्बो के पीछे नींद का भी साया होता है
यादो के दौर में बेबसी को भी जोश आता है
मै बगावत की सोचता हूँ पर ख़ामोशी ने मुझे रोका है

जयदीप भोगले
१८-९-९९ 

Friday, August 27, 2010

सदृश्यच्या मागे




संवेदना जेव्हा संपतात तेव्हा आघताची वेदना होत नसते
पण वारंवार होणा-या  आघतानेच संवेदना  संपत असते

                   महायुद्ध सुरु झाली म्हणजे रक्ताचा पाउस पडतो
                   पण एका रक्ताच्या थेम्बातुनाच  महयुद्धाचा  उदय होतो

डोंगराच्या वारुळात मुंग्यांची घरे असतात
पण वेळ अली म्हणजे त्या मेरुपर्वत ही गिळंकृत करतात
                         
खंडकाव्य म्हणे रामयण महाभारत चित्रित करतात
                          पण शब्दाने काव्याचे खंड बनतात
                         एक अक्षरच तिला अखंड बनवतात
 जयदीप भोगले
६-५-२००१

यूँ अगर होता

यूँ अगर होता के तुम पास होते
तो हम सितारों से ना बाते करते
   अगर जिन्दगी में तुम्हारी आँखों के साए रहते
    तो हम तपती धुप में यूँ जल ना जाते
अगर हमारे आंसू पोछने तुम्हारे हात ना आते
अश्क हमारे सागर बन जाते
       इस पागल दिल को ये सवाल ना रहते
      अगर जवाब हमारा तुम बन जाते
अगर गज़ल ही हमारी तुम बन जाते
शायरी के लिए ये खून के कतरे यूँ जाया ना जाते

जयदीप भोगले
३०-०९-१९९९

Wednesday, August 25, 2010

क़यामत



आज कुछ जख्म भर आये है
आँखों में उनकी नजरो के कुछ सपने सुहाने आये है
एक भोली सी नजर है वह
जिन के दिल के करीब हम आये है
तम्मनाओं की बहार से
एक कशिश लौट आई है
दश्त इ सहरा में एक कली सी खिल आई है
एक सवाल के आरजू से
वो जवाब बन के आई है
एक मासूम सा चेहरा है चेहरे पे लाली छाई है
इस संगदिल में धड़कन धडकते आई है
लगता है मुर्दे भी जिन्दा होते है
एक क़यामत जिंदगी बन के आई है
जयदीप भोगले
१८ नवम्बर २००३ 

अनकही


 कभी सपने हकीकतों के साथ
कभी आँखों और आंसुओ की बात
कभी तन्हाई और वो ख़यालात
यही है अनकही एक कहानी के साथ
               एक बारिश की बूँद धुप के बाद
               एक फूल की नरमी कांटो के बाद
                 वो बेखुदी कारवां के साथ
                यही है अनकही एक कहानी के साथ
एक आवाज ख़ामोशी के पास
एक लहर एक पत्थर के पास
एक जिन्दगी क़यामत के साथ
यही है अनकही एक कहानी के साथ
जयदीप भोगले
१२ नवम्बर २००४

Monday, August 23, 2010

पलटते पन्ने


इन पन्नो में लिखी कहानी कुछ नयी है कुछ पुरानी है
पलटते रहना ही बस इनके जिन्दगी की कहानी है
   कुछ हसीं लम्हों का जमाना इनमे छुपता है
   कभी तडपता दिल इनके सिने में सिसकता है

   पहली बरसात तो पहला पन्ना था
   अब गम के आंसू से ही इनको निभानी है
                कभी इंद्रधनुष भी इनमे बसता था
               एक चेहरे का चांद इनमे दिखता था
              अब चांदनी कि चमक तो चली गयी
             बस बुझते दिल कि रोशनी में जिंदगी कि कहानी लिख जानी है
     दिदार ए यार का बयां इसपे लिखा है
     ज़माने भर का प्यार इसमें बीता है
   अब हिज्र की कलम से ही इनको तक़दीर आजमानी है
    पलटते रहना ही बस इनके जिन्दगी की कहानी है
जयदीप भोगले
३० जून 2001

Sunday, August 22, 2010

चित्रकार




          टूटी रेखाओ    को    जोड़ता   हूँ 
          एक   रंग   का   सपना   सजाता   हूँ 
        जब   चित्रों   को   जिन्दा  मै  बनता  हूँ 
        तभी  अपने  व्यक्तित्व  में  एक  चित्रकार को  मै  पाता  हूँ 

कभी नदी नहरों को बहाता हूँ 
कभी आंसू भी छलकता हूँ
सूरज की किरणों की सचेतनता महसूस मै जब करता हूँ
तभी  अपने  व्यक्तित्व  में  एक  चित्रकार को  मै  पाता  हूँ 

               सपने मै जीता हूँ
                कई चेहरों की मुस्कान मै बनता हूँ 
               पर तेरे झील से नीली आँखों में जब मै खो जाता हूँ
              तभी  अपने  व्यक्तित्व  में  एक  चित्रकार को  मै  पाता  हूँ 
  
हाथ को मै बढ़ाता हूँ
रंगों को भी मै छूता हूँ
पर तेरी लाज भरी मुस्कान का रंग महसूस मै जब करता हूँ
तभी  अपने  व्यक्तित्व  में  एक  चित्रकार को  मै  पाता  हूँ 
                 पर कुछ दिनों से मै देखता हूँ
               उजाले में अँधेरे की कालिक मै पाता हूँ 
               जब तेरी जुदाई की सच्चाई को जब मै समझता हूँ
               एक कलाकार से बेबस मै बन जाता हूँ
               अपने चित्रकारी को मै भूल जाता हूँ
              अपने व्यक्तित्व में एक तड़पते प्रेमी को मै पाता हूँ

जयदीप भोगले
२०-०१-२००१    

Saturday, August 21, 2010

नतीजा

जब दिल धडकता है तो
जिंदा होने कि परवाह नाही होती
जब प्यार हो जाता है तो
नतीजे से जिंदगी बेजार नहीं होती
अगर नाव समुंदर में हो तो
भंवर कभी राह नहीं रोकता
अगर समेट  भी लिया तो प्यार में तकरार नहीं होती
जब राह ही फूलों की चुनी है
तो काँटों की चुभन से कराह नहीं उठती
अगर चुभ  भी गए तो लहूँ से जमीन सफ़ेद नहीं होती
अब नतीजा हां हो या ना हो
प्यार की कोई सीमा नहीं होती
अगर जीए तो प्यार में जीए
मर गए तो प्यार में शहीद हुए
आशिक की कभी हार नहीं होती
जयदीप भोगले
२४ -०६- २००३ 

स्वप्न

चांदण्या रात्रि चंद्राच्या साक्षीने
जात होतो मी सुगंधाच्या दिशेने
मुग्ध केले होते मनाचे कोने कोने
वेडे केले रे मला एका परीने
धुंद गाण्याची मैफल ऐकू येत नव्हती
जेव्हा तिच्या प्रेमागानात मलाच साद होती
काळोखात  पाउले पुढे जात होती
जेव्हा तिची प्रेमज्योत तेवतच होती
कंटकाचा हाताना स्पर्श ही नव्हता
जेव्हा गुलाबाच्या दिशेने माझा जीव होता
सोसाट्याचा वारा धावतच होता
पण आज मात्र तो माझा नावाडी होता
भेटली ती जेव्हा माझा शोध संपला
मुखकमलाने तिच्या मुग्ध केले रे मला
प्रेमालिंगानासाठी हात पुढे ते धावले
पण हाय रे दैवा !!!! गजराच्या घंटेने स्वप्न माझे ते भंगले
 जयदीप भोगले
२० -१० - ९८

Friday, August 20, 2010

विरह

डोळ्यात आसवे दाटून आली
आतूर हा जीव झाला
वाट तुझी पाहता सख्या रे
सूर्य ही मावळतीस आला
तू जीवनात येऊन अशी जादू केली
मृत्तिकेची माझी काया जणू कनकाची झाली
जगण्यास माझ्या अर्थ हा मिळाला
नदीकाठ हा आता पाहवेना
विरह अश्रुनी नदीस पूर आला
नाव तू घेउनी असे किना-यास यावे
तुझ्या नयनांच्या आरश्यात मी स्वत:ला पाहावे
आता विरह नको प्रिया चंद्र साक्षीस आला
मंद मंद ही रातराणी
सोबतीस शीतल झुळूक
आणि रात्र ही दिवाणी
अशी कातरवेळ जणू
युगुलांची जगावी
प्रहर लोटले पण तुझा निरोप न आला
कधी मज भासे विरहात सुख आहे
प्रेम माझे जीवापाड, जणू विरह मला सांगू पाहे
या एकाकी जगात, तुजवीण मज कोण आहे
माझ्या हृदयाचा जणू मला बंध हा मिळाला

जयदीप भोगले
१२-०९- २००३

Thursday, August 19, 2010

हवी हवीशी वाटणारी ... (ग्रेट) भेट



कार्यक्रम  - ग्रेट भेट
वाहिनी - आय  बी  एन  लोकमत 
वेळ   - शनिवार  ९ .३०  रात्रौ, रविवार दुपारी १२   

मित्रहो आपण कदाचित माझे लेख वाचत असलाच पण एक नवोदित ब्लॉगर   म्हणून मला आपल्या प्रतिक्रियांची  ही अपेक्षा आहे . जेणेकरून मी माझे  लेख दिवसेंदिवस सुधारू शकेन, प्रयत्न नक्कीच करेन . शेवट निर्णय आपला आहे .

आय बी एन वाहिनीवर  प्रक्षेपित  होणारा   ग्रेट  भेट  या   कार्यक्रम तसा सुरु होऊन बरेच दिवस झाले पण गेले काही रविवार मी नियमित बघत असतो.नियमीतपणा हा सवयीमुळे किवा आवडीमुळे निर्माण होतो असे म्हणतात
यात आपल्याला ज्यांच्याबद्दल जाणून घ्यावे वाटते , ज्यांनी आपल्या क्षेत्रात विशेष उंची गाठली आहे अशा काही दिग्गज सेलेब्रिटीबरोबर निखील वागळे दिलखुलास बातचीत करतात. मी ते त्यांची मुलाखत घेतात असे म्हणणार नाही कारण मुलाखती इतकी औपचारिकता न आणता पण समोरच्या व्यक्तीच्या आदराच्या स्थानाला धक्का न पोहचवता ते एक एक पान उलटत जातात असे वाटते. भेट मग राजकारणासारख्या रुक्ष भासण-या क्षेत्रातील दिग्गजांची असो की नाट्यक्षेत्रात , चित्रपट क्षेत्रासारख्या चंदेरी दुनियेतील असो ती तितक्याच सहजतेने आणि कलात्मक पद्धतीने पुढे जाते ही  या कार्याक्रमची खासियत वाटते.
गप्पा  होताना निखील वागळे कुठेही त्या व्यक्तिमत्वाच्या आड येतात असे वाटत नाही . हिंदी वाहिनींवर बर-याच वेळा मला असे प्रकर्षाने जाणवते की मुलाखातकाराची उंची आणि स्तर वाढवा आणि त्याच्या कौशल्याचे कुठे तरी मूल्यमापन व्हावे म्हणूनच की काय उत्तुंग व्यक्तींना बोलावण्यात येते आणि ह्यांची सिधी बात कधी वाकड्या वळणावर जाते ते कळतच नाही बहुदा ती सरळ रस्ता गाठतच नाही.
कार्यक्रम अगदीच व्यावसाईक नसल्यामुळे  घाईत लोकल पकडल्यासारखे ब्रेक घेण्याची इथे पद्धत नाही. आणि निखील वागळे आजचा सवाल यात घणाघाती शब्द घाव घालत असले तरी इथे कुठेतरी परिपक्व होऊन आपण कदाचित भेटीला येणा-या व्यक्तीचे स्वगत ऐकत आहोत इतक्या मुक्तपणे कार्यक्रम पुढे नेतात. 

कार्यक्रमातील व्यक्तींची निवड अगदी त्या चपखलपणे केलेली असते. मी निवडणुका असतना मा. शरद पवार, मा. राजसाहेब  ठाकरे. आणि इतर सर्व पक्षांच्या प्रमुख व्यक्तींची भेट बघितली आणि ती माणसे  वेगळ्या पक्षाची आहेत   एवढीच वेगळी वाटली त्यांची कामाची जिद्द , त्यांचा दृष्टीकोन हा सर्व कुठेतरी दिसून आला. त्यांची उंची  आपल्या आपल्या जागी श्रेष्ठ आहे असे कुठेतरी वाटुन गेले   . खरेतर निवडणुकींच्या काळात अशा पद्धतीने मुलाखत घेणे मला अवघड वाटते. (मी मुलाखत घेणारा नसलो  तरीही )  
डॉक्टर लागूंची मुलाखत , शोभा दे यांची मुलाखत या मला विशेष आवडल्या कदाचित मला त्या क्षेत्राबद्दल आवड आहे किवा कुतूहल आहे म्हणून सुद्धा असेल .पण बाकी ग्रेट भेटी सुद्धा मला तितक्याच भावून गेल्या.,  कुठेतरी हव्या हव्याशा वाटून गेल्या .
मूल्यमापनच करायचे झाले  तर ई टी वी वरचा संवाद हा एकाच कार्यक्रम कदाचित याच्या स्पर्धेत टिकू शकेल किंवा कदाचित थोडा वरचढ ठरेल असे मला सांगावे वाटते .पण त्यामुळे याची गुणवत्ता कुठेही कमी पडत नाही 
येत्या रविवारी नुकतेच काळाच्या पडद्याआड गेलेले दिवंगत आ. नारायण सुर्वे यांची पुर्वासंग्रहित ग्रेट भेट असणार आहे हे मला वाहिनीच्या संकेतस्थळावर कळाले. आपण माझ्या मतांशी सहमत असाल किंवा या लेखामुळे आपले भेटीबद्दल कुतूहल वाढले असेल, तर चला तर मग ... वाफाळलेल्या चहाच्या कपाबरोबर एका नवीन भेटीला ...   
जयदीप भोगले 

Wednesday, August 18, 2010

आशिक की दास्ताँ

तुम इस मोड़ पे मुझसे मिले की जहाँ आगे रास्ता नहीं था
हाथ बढाया था तुने मगर तब मेरा साथ ही नहीं था
             तड़पता रहा मई पानी के बिना मगर वहां कोई नहीं था
तुमने सागर बहाया  मगर मेरी साँसों में तब दम ही नहीं था
      लौट रही थी मन की मौजे मन के समुंदर में जब साहिल ही नहीं था
         अब साहिल इन्तजार करता है रात दिन जब दरया में पानी ही नहीं था
मेरी ख़राशे घाव बन गए तब दवा लगाने कोई नहीं था
तुम मरहम लेके आ गए जब घाव क्या मै ही नहीं था
        अब न बहाओ आसुंओ को मै आज नहीं कल था
       पर सुनना लोगों से कभी किस्सों में  ... तुम्हारा भी आशिक हुआ करता था 
जयदीप भोगले
१८ -१०-१९९९    

Tuesday, August 17, 2010

सवाल मत पुछो


धडकनों को ना पुछो की तुम क्यों धडकती हो
चिरागों को न पुछो तुम क्यों सुलगते हो
फूल को ना पुछो तुम क्यों महकते हो
सवाल ना करो मेरे यारो
क्यों आशिकों को परखते हो
                  पायल क्यों छनकती  है
                    बुलबुल क्यों चहकती है
                  हवा का झोंका ना हो तो भी
                   चिलमन क्यों लहराती है
             महसूस करो इनको मेरे यारो
                 क्यों लब्ज पे अटकते हो
हीना कब रंग लती है
कली कब फूल बन जाती है
शायरी कब बन जाती है
जवाब ना मांगो मेरे यारो
मोहब्बत सब सिखाती है

जयदीप भोगले
१० एप्रिल  १९९९

Monday, August 16, 2010

मास मिन्ग्लिंग - एका नव्या युगाची वाटचाल







आजच्या युगात ऑनलाइन क़िवा इन्टरनेट वर जाणारे लोक म्हणजे समाजपासुन  अलिप्त  किंवा एकलकोंडे असे उरले नाहीत . आता आपण एक विरोधाभासी आणि अत्याधुनिक चळवळ  अनुभवत आहोत. आज संपर्क तंत्रज्ञान लोकाना जोडून त्याना ख-या  अणि विस्तृत जगाशी संपर्कात आणण्याचा यत्न करत आहे.
संगणक ज्योतिर्भास्करानी एका दशाकापुर्वी सांगितलेले भाकित सत्यात उतरत आहे. आता लाखो लोक आपल्या जगण्याचा बहुतांशी वेळ ऑनलाइन घालवत आहेत नव्हे तर आनंदाने त्यात जगत आहेत. पण याचा अर्थ असा नव्हे की सर्व नवीन पीढ़ी घरकोंबडी  अणि समाजपरान्ग्मुख  होण्याकडे  वाटचाल करत आहेत,तर सामाजिक माध्यमे अणि मोबाइल संवाद एका सामाजिक मेळावा  या सज्ञेचे सिंचन करून  नवीन ऑनलाइन युगाची वाटचाल करत आहे.
याला व्यापारक्षेत्रात ' मास मिंग्लिंग' असे संबोधण्यात येते
या क्रान्ति मागील कारण शोधणेही तितकेच महत्वाचे वाटते. या क्रांतिचे सर्वात महत्वाचे कारण म्हणजे लोकांची जनसंपर्कात राहण्याची आवड. मास मिंग्लिंग हे कुठल्याही प्रवृतिसारखेच लोकांच्या जनसंपर्कात राहण्याच्या आवडीमुळे   वाढते.
संगणकक्रान्ति अणि इन्टरनेट यामुळे  ही गरज  भागवणे लोकाना अधिक सोपे होऊ लागले आहे. याच कारणामुळे  लाखो लोक आपल्या आवडी निवडी, छंद, राजकीय विचारसरणी, आपल्या सौष्ठावाची माहिती मुक्तपणे प्रसिद्ध करून समविचारी हजारो मित्रमंडळे तयार करत आहेत.
काही आकडेवारी इथे नमूद करणे आवश्यक वाटते ( ही सर्व इन्टनेट जगतातील नेटवर्किंग संकेतस्थले आहेत )
ट्विट्टर -१० कोटि पेक्षा अधिक सभासद अणि ५० कोटि ट्वीट( शाब्दिक चकमक) रोज पाठवल्या जातात
फेसबुक -५० कोटि सभासद सरासरी प्रत्येकाला १३० मित्र आहेत व ती ५५ मिनिटे संकेतस्थलावर घालवतात, अणि यापैकी तीन जाने आपल्या जगातल्या पार्टीची आमंत्रने यावरून स्विकारतात.
लिंक्ड इन - साडे सहा कोटि सभासद अणि एका मिनिटाला एक नवीन सभासद सलग्न होतो.
आणि ही नवयुवा पीढ़ी  आपले अनुभव यूट्यूब , ब्लोग्स,फेसबुकच्या माध्यमाने जगाला कळवत  आहेत अणि हवे तेंव्हा हव्या त्या ठिकाणी पाहून आनंद लूटत आहेत
लोकांना खरे जग तेवढेच आवडते अणि हवे असते अणि त्यामुले ऑनलाइन तंत्राचा वापर लोक आणि व्यापारी जगत मीटिंग, सभा, पार्टी, मेळावा  या सर्वांसाठी करत आहेत. आज प्रवासी कंपन्या जगामधाला एक उत्तम व्यापार  होणे  संभाषण क्रान्तिमुळेच शक्य झाले आहे.
भारतामध्ये या युगाचा अनुभव किंवा परिणाम काही मोठ्या शहरात अणि अगदी तरुण पीढ़ीमध्ये बघायला मिळतो  पण पाश्चात्य देशात ही संस्कृति अधिकाधिक प्रगत व फैलावत चालली आहे.
कदाचित ही जगाला जवळ आणण्याची पद्धत काही पुराणमतवादी लोकाना अभिव्यक्ति स्वातंत्र्यावर घाला, भारतीय संस्कृतीवर प्रहार करणारी वाटू शकते पण आज असंख्य विद्यार्थी, ,नोकरिनिम्मित परदेशात राहणारे लोक यांचा दृष्टिकोण ही पडताळण्याची गरज आहे असे मला प्रकर्षाने नमूद करावे वाटते 
"ISD आणि STD च्या काळात क़िवा त्याआधी घड्याळाकडे  बघत बोलणारी, एका महिन्यनातर आलेले पत्र वाचत रडणं-या  आईची माया चांगली? की आज ऑनलाइन "chat करणारी ईमेल वर फोटो बघणारी भरारी अधिक चांगली ?याची बरोबरी करणे कठीण  आहे . शेवटी तंत्रज्ञान बद्लामुले मायेच्या ओलाव्याला कोरडेपण  कधीच येणार नाही असे मला सांगावेसे वाटते.
या अगम्य अणि अद्भुत जगाचे  आपण पुरोगामी विचारने स्वागत करायला हवे , तेव्हांच एक दिवस आपल्या भारतातल्या आईने केलेला दिवालिचा फराळ  आपली अमेरिकेतली मुलगी, बंगलौरमधला मुलगा, अणि जर्मनीमधला  भाऊ खात खात त्याच्या चाविबद्दल खुमासदार चर्चा ... ( नाही च्याट ) करत दिवाळी  साजरी करतील ...

जयदीप भोगले

किमत

   पैसे  के दोस्त है सारे
  पैसा सबका दुश्मन
  नाम का है ये पैसा यारो 
  कच्चे इसके बंधन
         मकान देता है ये पैसा 'घर' नही
       ' आसामी' बनती है इसके दम पे इन्सान नही
        सोना खरीदता है ये दिल नही
       पैसे के पेड से बाग खिलते नही सुने पडते है आंगन
      
पांचाली दावं पर लगायी इसने
                                                             रिश्तो मी दरार लायी इसने
                                               पर आदमी इन्सान जोड न सका
पैसे को गले लागाय उसने 
गुण परखे जाते है दिल से
पर स्वार्थ का बनाया इसने दर्पण
                      
फिर भी बनते है आज भी ' भीमराव'
                      पैसे को रौन्धकर
                     श्रीकृष्ण सुदामा कि यारी ऐसी
                     जो अमर हो गयी पैसे कि दिवार चीरकर
एक सच्चा दोस्त होता है
पैसे से कही बढकर
अपना दोस्ती को ए मनुज 
तोड के सारे बंधन
किमत परख दोस्ती की
यही है कस्तुरी यही है चंदन 

जयदीप भोगले
२७ - जून -१९९९


Friday, August 13, 2010

अफलातून..?? तद्दन फालतू ....

कार्यक्रम - अफलातून लिटल मास्टर्स ( म्हणजे अगोचर मूले )
वाहिनी - ई टीवी
वेळ - बुधवार गुरुवार ९.३० रात्रौ

मित्रहो कदाचित हा लेख वाचून तुम्हाला माझे ई टीवी वहिनीबरोबर वैर किवा त्या वाहिनीबद्दल तुम्हा सर्वांचे मत कलुषित व्हावे अशी इच्छा आहे असे वाटणार किवा वाटू शकते. (कारण मी बाजीराव मस्तानी बद्दल ही फार शिफारसीचे लिहिले नव्हते.).
पण राजू परुळेकरांचा संवाद , "आठवणीतले बाबूजी.. हा शो , एके काळी ताजी असणारी मालिका -या गोजिरवाण्या घरात या मला मनापासून आवडतात ..अगदी आजही... म्हणूनच दोन्ही तर्क आपण मनातून काढून टाकावेत.
मी मराठी वाहिनी पाहणारा व त्याबद्दल प्रेम वाटणारा एक दर्शक आहे. कुठलाही अ-दर्शनीय कार्यक्रम पाहून मनाला वाटणारा विषाद मी आपल्यासमोर मांडतो. किवा चांगला वाटणारा कार्यक्रम,सिनेमा आपण पाहावा त्याचा आनंद लुटावा अशी माझी इच्छा असते.
तसा अफलातून हा कार्यक्रम सुरु होऊन बरेच दिवस झाले पण सुरवातीला अगदी वाईट मत ते ही लहान मुलांच्या कार्यक्रमाबद्दल छे छे .. म्हणून मी गप्प होतो . पण आता कालच हा कार्यक्रम पहिला आणि मला राहवले नाही आणि की-बोर्ड हातात घेतला ( पूर्वी लेखणी घ्यायचो .. जरा वाक्प्रचारात बदल)
आता जरा कार्यक्रमाबद्दल बोलतो की बोलावे हे जरा कठीणच आहे पण आता मीच सांगणार म्हणजे सांगणे भाग आहे.
काही अगोचर पोरे विनोदबुद्धी नसताना उगाच स्टेजवर येऊन धुडगूस घालतात . ब-याच वेळा त्यांना काय म्हणायचे आहे हे तुम्हाला जर कळले तर मला कळवा. त्यात सूत्रसंचालन असंभव मधील सुलेखा -नीलम शिर्के आणि एका पेक्षा एक छोटे चम्पिएन्स मधील छोटी मुलगी जमेल तितके अवसान आणून स्पर्धकांना चांगले म्हणतात. आता या दोघी कॉमेडी कार्यक्रमात सूत्र संचालन कशा आणि का करतात ? झी वाहिनीवर लोकप्रिय झाल्या म्हणून कदाचित ..
इंडिअन लाफ्टर च्यालेंज चा विजेते सुनील पाल आणि प्रेक्षकाच्या हृदयात आपल्या हास्याचे हळुवार फवारे मारणारे आपले लाडके प्रशांत दामले या कार्यक्रमचे मान्यवर परीक्षक ( दुर्दैवी) आहेत . या बिचा-यांना या मुलांना काय सांगावे तेच कळत नाही . सुनील पाल (हिंदी वाहिनीवरची सवय )असल्यामुळे बेमालूमपणे हसण्याचा उत्तम प्रयोग सादर करतात. प्रशांत दामले आपण लहानपणी कसे होतो ( उत्तम) आणि इथे कुठून आलो अशा हावभावात कार्यक्रम पुढे रेटतात.
तूमची विनोदबुद्धी अगदी सढळ मराठवाडी असेल तरी आपण त्या कार्याक्रमातील विसंगती आणि उगाच टाळ्या ( आधी वाजवून घेतलेल्या ) वाजवणाऱ्या प्रेक्षकांना बघून तुम्ही हसू शकता . लहान मुलांना प्रोत्साहन द्यावे हे कबूल आहे पण ते सा रे ग म प , एका पेक्षा एक , कलर्स मधील छोटे उस्ताद यांनी ही दिले पण त्या बरोबर प्रेक्षकांना मनोरंजन अव्वल दर्जाचे मिळावे याबद्दल ही दक्षता घेतली.
कुठलाही कार्यक्रम असो त्यातला गुणवत्तेचा दर्जा अगदी.. ग्रामीण भागात आवडणारा असला तरीही, चांगलाच हवा. माझ्या मते अगदी छोट्या मुलांना सुद्धा फाजील प्रोत्साहन देण्यात की अर्थ आहे.? कदाचित वाहिनीवर येण्याचा अट्टाहास आणि त्या चंदेरी जगाचे आकर्षण असल्यामुळे काही मुले अभ्यास चांगला करत असतील ,किवा चित्र काढत असतील तरी या सवंग प्रसिद्धीच्या मागे लागतात आणि त्यांचे पालक ही त्यांचे कौतुक करतात. म्हणूनच कि काय असले दर्जाहीन कार्यक्रम आपल्याला काही वाहिन्यांवर दिसतात .
आणि मी असे ऐकले आहे या कार्यक्रमाची  टी आर पी चांगली आहे ( हा एक विरोधाभास म्हणावा लागेल .)

आता माझे मत आपल्याला आत्यंतिक वाटत असेल तर आपणच पाहून खात्री करावी आणि कळावे .

जयदीप भोगले  म

एव्हरेस्ट

 ज्याचे त्याचे एव्हरेस्ट एव्हरेस्ट अस शिखर एकच नसतं प्रत्येक माणसाचं एव्हरेस्ट वेगळं असतं उंची कमी जास्त असेल समाजात शिखराची पण सर केल्यावरच...